भिलाई वेब वार्ता 3 जनवरी आज भिलाई स्टील प्लांट शेड्यूल्ड ट्राइब एम्पलाईज वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा आदिवासी महापुरुष मारांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा की 123वीं जयंती मनाई गई। इस अवसर पर एसोसिएशन के सदस्यों ने उनके चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की और आदिवासी समाज के उत्थान में उनके योगदान पर चर्चा की। कार्यक्रम में सदस्यों ने जयपाल सिंह मुंडा को आदिवासी अस्मिता का प्रतीक बताते हुए कहा कि उनकी विरासत आज भी युवाओं को प्रेरित करती है। एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री प्रदीप टोप्पो ने बताया कि यह आयोजन आदिवासी कर्मचारियों के बीच एकता और जागरूकता बढ़ाने का माध्यम है, जहां जयपाल सिंह मुंडा के जीवन से सीख लेकर सामाजिक न्याय की लड़ाई को मजबूत किया जाएगा।
मारांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा एक ऐसे बहुमुखी व्यक्तित्व थे, जिन्होंने खेल के मैदान से लेकर संविधान सभा की बहसों तक आदिवासी अधिकारों की मजबूत पैरवी की। ऑक्सफोर्ड से शिक्षित इस ओलंपियन ने न केवल भारत को पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक दिलाया, बल्कि आदिवासियों के लिए अलग राज्य की नींव रखी। उनकी जीवनी किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं है, जो संघर्ष, समर्पण और सफलता की मिसाल पेश करती है। वे झारखंड राज्य के निर्माण के पुरोधा माने जाते हैं और आदिवासी समाज में उन्हें “मारांग गोमके” (महान नेता) की उपाधि से नवाजा जाता है।
प्रारंभिक जीवन: गांव से वैश्विक मंच तक की यात्रा
जयपाल सिंह मुंडा का जन्म 3 जनवरी 1903 को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रेसीडेंसी के रांची जिले (वर्तमान झारखंड के खूंटी जिले) के टकरा पाहनटोली गांव में एक मुंडा आदिवासी परिवार में हुआ। उनका मूल नाम प्रमोद पाहन था, जो बाद में जयपाल सिंह मुंडा हो गया। बचपन में वे गांव में मवेशी चराते थे, लेकिन उनकी असाधारण प्रतिभा को पहचानते हुए इंग्लैंड के मिशनरी ने उन्हें स्थानीय स्कूल में दाखिला दिलाया। 1910 में वे रांची के सेंट पॉल स्कूल में भर्ती हुए, जहां उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ खेल और नेतृत्व क्षमता में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। मिशनरियों की मदद से 1918 में उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा गया, जो उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
शिक्षा: ऑक्सफोर्ड से वैश्विक दृष्टिकोण
जयपाल सिंह मुंडा की शिक्षा यात्रा गांव से शुरू होकर विश्व प्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी तक पहुंची। इंग्लैंड पहुंचकर पहले वे कैंटरबरी के सेंट ऑगस्टाइन कॉलेज में पढ़े, फिर 1922 में ऑक्सफोर्ड के सेंट जॉन्स कॉलेज में स्थानांतरित हुए। वहां उन्होंने अर्थशास्त्र में ऑनर्स डिग्री (एमए) प्राप्त की। ऑक्सफोर्ड में वे डिबेटिंग सोसाइटी और एसेज सोसाइटी के सक्रिय सदस्य रहे। उन्होंने इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस) परीक्षा उत्तीर्ण की और इंटरव्यू में टॉप किया, लेकिन आदिवासी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए इस प्रतिष्ठित नौकरी को ठुकरा दिया।
भारत लौटने के बाद उनकी शिक्षा का उपयोग व्यावहारिक रूप में हुआ। 1934 में वे घाना के अचिमोटा कॉलेज में शिक्षक बने, 1937 में रायपुर के राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल और 1938 में बीकानेर रियासत के विदेश सचिव नियुक्त हुए। उनकी शिक्षा ने उन्हें वैश्विक दृष्टिकोण प्रदान किया, जिसका उपयोग उन्होंने आदिवासी अधिकारों की लड़ाई में किया।
खेल उपलब्धियां:ओलंपिक में भारत की पहली सुनहरी जीत
जयपाल सिंह मुंडा खेल जगत में एक चमकदार सितारे थे। वे एक कुशल डिफेंडर थे और ऑक्सफोर्ड में हॉकी टीम के कप्तान बने। 1925 में वे पहले भारतीय बने जिन्हें “ऑक्सफोर्ड हॉकी ब्लू” सम्मान मिला। वे विंबलडन हॉकी क्लब के लिए भी खेले। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम (ब्रिटिश इंडिया) की कप्तानी थी। टीम ने पूरे टूर्नामेंट में बिना एक भी गोल खाए 17 मैचों में 16 जीत और एक ड्रॉ हासिल किया। फाइनल में भारत ने हॉलैंड को 3-0 से हराकर स्वर्ण पदक जीता, जो भारत का पहला ओलंपिक गोल्ड था।
भारत लौटकर 1929 में उन्होंने कोलकाता के मोहन बागान क्लब की हॉकी टीम स्थापित की और विभिन्न टूर्नामेंटों में नेतृत्व किया। सेवानिवृत्ति के बाद वे बंगाल हॉकी एसोसिएशन के सचिव और इंडियन स्पोर्ट्स काउंसिल के सदस्य बने। उनकी खेल यात्रा ने आदिवासी युवाओं को साबित किया कि वे वैश्विक स्तर पर चमक सकते हैं और बाधाओं को पार कर सकते हैं।
संविधान सभा में योगदान: आदिवासियों की मजबूत आवाज
1946 में जयपाल सिंह मुंडा बिहार से संविधान सभा के सदस्य चुने गए। वे आदिवासी समुदाय के प्रमुख प्रतिनिधि थे और कुल पांच आदिवासी सदस्यों में से एक। वे सलाहकार समिति (Advisory Committee) और गैर-असम आदिवासी क्षेत्रों की उप-समिति के सदस्य थे। इन समितियों की रिपोर्टों ने संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूचियों का आधार तैयार किया, जो आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन और स्वायत्तता से संबंधित हैं।
उनके प्रसिद्ध भाषण में 19 दिसंबर 1946 को उद्देश्य प्रस्ताव पर उन्होंने कहा: “एक आदिवासी के रूप में मुझे इस प्रस्ताव की कानूनी जटिलताओं को समझने की उम्मीद नहीं है। लेकिन मेरी सामान्य समझ मुझे बताती है कि हमें सबको स्वतंत्रता की राह पर चलना चाहिए और साथ लड़ना चाहिए। सर, अगर कोई भारतीय समूह है जिसके साथ शर्मनाक व्यवहार किया गया है, तो वह मेरे लोग हैं। उन्हें कई वर्षों से अपमानजनक तरीके से उपेक्षित किया गया है… मैं पंडित जवाहरलाल नेहरू को उनके शब्दों पर लेता हूं। मैं आप सभी को आपके शब्दों पर लेता हूं कि अब हम एक नया अध्याय शुरू करने जा रहे हैं, जहां अवसर की समानता है, जहां किसी की उपेक्षा नहीं की जाएगी।”
उन्होंने नागा मुद्दे पर बहस की और भारत से अलग होने के खिलाफ चेतावनी दी। उनकी पैरवी से आदिवासी भूमि अधिकारों, सांस्कृतिक संरक्षण और स्वशासन को मजबूती मिली, जिससे अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण और विशेष प्रावधान सुनिश्चित हुए। इतिहासकार उन्हें पांचवीं और छठी अनुसूचियों का मस्तिष्क मानते हैं।
अन्य उपलब्धियां: राजनीतिक और सामाजिक क्रांति
1938 में पटना और रांची की यात्रा के दौरान आदिवासियों की दुर्दशा देखकर जयपाल सिंह मुंडा ने राजनीति में प्रवेश किया। 1939 में वे आदिवासी महासभा के अध्यक्ष बने और 1940 के रामगढ़ कांग्रेस सेशन में सुभाष चंद्र बोस से अलग झारखंड राज्य की मांग की। 1949-50 में उन्होंने झारखंड पार्टी की स्थापना की, जो आदिवासी हितों के लिए समर्पित थी। 1952 के चुनावों में पार्टी ने 32 सीटें जीतीं। वे 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा सदस्य चुने गए (रांची वेस्ट/खूंटी से)। 1955 में स्टेट्स रीऑर्गनाइजेशन कमीशन को अलग झारखंड की मांग सौंपी, हालांकि तब अस्वीकृत हुई। 1963 में पार्टी को कांग्रेस में विलय कर दिया।
वे एक प्रखर लेखक भी थे। उनकी आत्मकथा Lo Bir Sendra (2004) और लेख-संकलन Adivasidom (2017) प्रकाशित हुए। उन्होंने आदिवासी भूमि संरक्षण, सांस्कृतिक विरासत और शोषण के खिलाफ आंदोलन चलाए। उनकी पहल से 400 आदिवासी समूहों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला और 7.5% आरक्षण सुनिश्चित हुआ।
विरासत: अमर प्रेरणा का स्रोत
जयपाल सिंह मुंडा की विरासत झारखंड राज्य में जीवित है। रांची में 2013 में उनके नाम पर स्टेडियम खुला, अमरकंटक में इंदिरा गांधी नेशनल ट्राइबल यूनिवर्सिटी में 2019 में स्टेडियम स्थापित हुआ। 2022 में झारखंड सरकार ने “मारांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा ओवरसीज स्कॉलरशिप” शुरू की, जो आदिवासी छात्रों को यूके में उच्च शिक्षा के लिए पूर्ण सहायता प्रदान करती है।
वे आदिवासी पहचान के प्रतीक हैं, जिन्होंने गर्व से कहा: “मैं अभिमान से कहता हूं कि मैं जंगली हूं।” एसोसिएशन के इस आयोजन ने उनकी स्मृति को नई ऊर्जा दी है।एसोसिएशन ने उनकी जयंती पर उन्हें सादर नमन किया! जय जोहार!
कार्यक्रम में अध्यक्ष श्री प्रदीप टोप्पो, कार्यकारी उपाध्यक्ष श्री अजय कुमार, उपाध्यक्ष II श्री मनोज हेम्ब्ररोम, महासचिव श्री श्याम सुंदर मुर्मू, कोषाध्यक्ष श्री भिमांशु कच्छप, जोनल सचिव श्री किरण बास्की, श्री टीकाराम हेम्ब्ररोम एवं श्री राधेश्याम सोरी सदस्यगण उपस्थित रहे।
