दुर्ग।17 अक्टूबर।वेब वार्ता।डॉ बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर वाचनालय जवाहर नगर दुर्ग में दि बुध्दिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया जिला शाखा दुर्ग एवं महिला सशक्तिकरण संघ छत्तीसगढ़ प्रदेश के संयुक्त तत्वावधान में ६८वा धम्म दीक्षा दिवस समारोह बड़े ही हर्षो उल्लास पूर्वक मनाया गया इस अवसर पर सर्वप्रथम शाक्य मुनि महाकारुणिक तथागत भगवान गौतम बुध्द एवं विश्व रत्न्बोधीसत्व डॉक्टर बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर जी के छायाचित्र पर भारतीय बौद्ध महासभा के राष्ट्रीय ट्रस्टी एस आर कानडे बौध्द ने पुष्प एवं माल्या अर्पण कर दीप प्रज्वलित किया। तत्पश्चात आयुष्मान जेपी बागडे विपश्यना चार्य ने उपस्थित बाद उपासक और उपासिकाओं को त्रिशरण पंचशील एवं बुद्ध वंदना धम्मवंदना, संघ वंदना का पाठ करवाया। उसके बाद उन्होंने उपस्थित जन समुदाय को तथागत गौतम बुद्ध की शिक्षा को विपश्यना के माध्यम से जानने का सूत्र बताए। महिला सशक्तिकरण संघ छत्तीसगढ़ प्रदेश की अध्यक्ष आयुष्मति प्रज्ञा बौद्ध ने अपने उद्बोधन में बताया कि आज से 68 वर्ष पहले डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की दीक्षाभूमि में भारत कुशीनगर के सबसे वरिष्ठ महास्थविर पूज्य भंन्ते चंद्रमणि से माई साहब डॉ सविता अंबेडकर के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा ग्रहण किया। साथ ही दीक्षाभूमि में अपने 6लाख अनुयायियों को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी और 22 प्रतिज्ञाएं भी दिलवाई। आज हम लोग 68वां धम्म दीक्षा दिवस समारोह मनारहे है। यदि प्रतिवर्ष इतने ही लोग बौद्ध दीक्षा ग्रहण करते तो निश्चित ही इतने वर्षों में आज हमारी आबादी 10 करोड़ हो जाती। हमारे देश के सीमावर्ती देश में बौद्ध धम्म का पालन किया जाता है। सभा को शोभा जामुलकर, इंदू ताई ढोक, सुधा डोंगरे ने भी संबोधित किया। दि बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीय ट्रस्टी एस आर कानडे बौध्द ने बताया कि डॉ बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन में बहुत सारी धार्मिक एवं सामाजिक विषमताओं कोझेला उन्हें दूर करने का अथक प्रयास भी किया किंतु वे रूढ़िवादी एवं अंधविश्वासों के प्रति असहाय हुए। उन्होंने अपने जीवन में कई सत्याग्रह किया । महाराष्ट्र में महाड़ का चवदार सत्याग्रह नासिक में कालाराममंदिर सत्याग्रह किया। 13 अक्टूबर 1935 नासिक के पास येवलाके सभा में उन्होंने घोषणा की मैं जिस धर्म में पैदा हुआ यह मेरे बस की बात नहीं थी किंतु इस धर्म में मैं नहीं मारूंगा यह मेरे बस की बात है। इस 21 वर्षों में उन्होंने भारत के सभी धर्म का तुलनात्मक अध्ययन किया कई पुस्तक भी लिखी। अंत में भारत की प्राचीन धम्म ऐहि धम्मों सनातनों त तथागत भगवान बुद्ध के धम्म को अपने की घोषणा किया। और उन्होंने 14 अक्टूबर 1956 को अपने इस प्रतिज्ञा को चरितार्थ किया । सभी धर्म में अपने आप को ईश्वर का दूत बताया। किंतु तथागत गौतम बुद्ध ने अपने आप को कभी ईश्वर का अवतार नहीं माना और अपने आप को मोक्ष दाता होने का दवा नहीं किया। उन्होंने कहा मैं केवल मार्ग दाता हूं। बुद्ध की शिक्षा चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग है जिसको धारण कर सभी मानव अपने दुखों से छुटकारा पा सकते हैं। इस अवसर पर प्रज्ञा बौद्ध इंदु ढोक सुधा डोंगरे शोभा जामुलकर रंजना वालवानदरे नूतन पाखिडे प्रमिला राऊत वंदना घरडे, मंजू दहाटे, बबीता मेश्राम लोखंडे साहब संजू श्याम कुंवर जेपी बागडे सीके डोंगरे ऊषा भौतमागे इत्यादि लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन सी के डोंगरे ने किया तथा आभार प्रदर्शन रंजना वालवानदरे ने की।
