भिलाई दिनांक 08 नवम्बर वेब वार्ता.. अमर बलिदानी आदिवासी क्रांतिवीर राघोजी भांगरे (Raghoji Bhangre) देवगांव, महाराष्ट्र, जनजाति: कोली की २२०वीं जयंती पर भिलाई स्टील प्लांत शेड्यूल्ड ट्राइब एम्पलाईज वेलफेयर एसोसिएशन के द्वारा फूलमाल्यार्पण कर कोटि-कोटि वंदन, नमन और श्रद्धासुमन!कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री प्रदीप टोप्पो के द्वारा किया गया। एसोसिएशन के महासचिव श्री श्याम सुंदर मुर्मू ने राघोजी भांगरे के जीवन पर प्रकाश डाला।
8 नवंबर 1805 को सह्याद्री की पवित्र गोद में बसे महाराष्ट्र के देवगांव गांव में रामजी भांगरे और रमाबाई की कोख से जन्मे इस बाल-वीर राघोजी भांगरे ने मात्र 10-13 वर्ष की नन्ही उम्र में ही माँ भारती के अपमान और जनजातीय अस्मिता पर हुए अत्याचारों की आग में जलकर क्रांति की ज्वाला प्रज्वलित कर दी। उनके पिता रामजी भांगरे, जो पहले ब्रिटिश पुलिस में जमादार थे, ने भी अन्याय देखकर नौकरी ठुकराई और विद्रोह का झंडा बुलंद किया। पिता की गिरफ्तारी, काला पानी की सजा और अंततः शहादत ने छोटे राघोजी के दिल में बदले की आग सुलगा दी। ब्रिटिशों ने उनके साथी रामा किरवा को 1830 में फांसी दी, तो राघोजी को लालच देकर नौकरी ऑफर की – लेकिन पदोपदी अपमान और साहूकारों के जुल्मों ने उन्हें विद्रोही बना दिया।
1838 से शुरू हुए उनके विद्रोह ने सह्याद्री की घाटियों को कंपा दिया। राघोजी ने अपने भाई बापूजी भांगरे, बहन रुकमिणी खाडे और साथियों – धावला भांगरे, बालू पिचाड, कालू साबले, जावजी बंबले, गोविंदराव खाडे, किसना खाडे, राया ठाकरे जैसे वीरों के साथ – रतनगढ़ और संगढ़ (सुनगढ़) किलों पर कब्जा जमाया। अहमदनगर, पुणे, नासिक, सातारा, पुरंदर तक गुरिल्ला युद्ध की गूंज फैलाई। ब्रिटिश खजाने लूटे, साहूकारों-जमींदारों की नाक-कान काटकर उनके अत्याचारों का प्रतिकार किया – क्योंकि ये लालची महाजन आदिवासियों की जमीनें हड़पते, अनगिनत ब्याज वसूलते और ब्रिटिश संरक्षण में जनजातियों को गुलाम बनाते थे। राघोजी की सेना ने घने जंगलों, दुर्गम घाटियों में छिपकर हमले किए, ब्रिटिश अफसरों और सैनिकों को मौत के घाट उतारा। 1844 में एक ब्रिटिश अधिकारी और 10 सिपाहियों को मार गिराया। उनका विद्रोह सिर्फ लूट नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की लड़ाई था – जनजातीय स्वाभिमान, किसान-आदिवासी अधिकारों और माँ भारती की आजादी के लिए!ब्रिटिश कैप्टन मैकिंटोश ने सभी रास्ते ब्लॉक किए, गद्दारों से जानकारी ली। फितूरी हुई, बापूजी भांगरे शहीद हुए। राघोजी गोसावी वेश में छिपे, लेकिन 2 मई 1848 को ठाणे सेंट्रल जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। उनकी शहादत की हर बूंद आज भी हमारे रगों में क्रांति का संदेश दे रही है! दिल रो पड़ता है सोचकर कि एक नन्हा बालक कैसे सह्याद्री का शेर बना, कैसे अंग्रेजों की नींव हिला दी। ज्योतिबा फुले जैसे महान सुधारक भी उनके विद्रोह से प्रेरित हुए।
आज उनकी जयंती पर आँसुओं भरी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए संकल्प लेने की आवश्यकता है कि – हम उनके बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने दें! बल्कि उनके आदर्शों पर चलकर जनजातीय गौरव, स्वाभिमान, राष्ट्रप्रेम और अन्याय के खिलाफ लड़ाई को जीवंत रखेंगे।अमर बलिदानी राघोजी भांगरे को शव शत नमन! राघोजी भांगरे अमर रहें!कार्यक्रम में प्रदीप टोप्पो, श्याम सुंदर मुर्म, ललित कुमार बघेल, राम सिंह मरकाम, भिमांशु कच्छप, ओमनाथ नेताम, भागवत प्रसाद ध्रुव उपस्थित रहें।
