बिलासपुर 2 अप्रैल वेबवार्ता छत्तीसगढ़ की सियासत को दो दशक पहले झकझोर देने वाले बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में आज़ गुरुवार को एक निर्णायक मोड़ तब सामने आया ज़ब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की स्पेशल डिवीजन बेंच ने मामले में अहम फैसला सुनाते हुए अमित जोगी को दोषी करार दिया है और उन्हें तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने के निर्देश दिए हैं।इस फैसले के बाद प्रदेश ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में भी हलचल तेज हो गई है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने केंद्रीय जांच एजेंसी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि मामले में प्रस्तुत साक्ष्य, गवाहों के बयान और परिस्थितिजन्य तथ्यों के आधार पर अमित जोगी की संलिप्तता स्थापित होती है!
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आरोपी को 21 दिनों के भीतर संबंधित न्यायालय में सरेंडर करना होगा।
यह फैसला उस समय आया है, जब निचली अदालत ने पूर्व में उन्हें साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया था।
ज्ञातव्य हो कि यह मामला 4 जून 2003 का है, जब रामावतार जग्गी की अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। उस समय जग्गी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) से जुड़े सक्रिय नेता थे।
इस हत्याकांड ने तत्कालीन छत्तीसगढ़ की राजनीति में बड़ा भूचाल ला दिया था। घटना के पीछे राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और आपराधिक साजिश की आशंकाएं जताई गई थीं।
मामले में कुल 31 आरोपियों को नामजद किया गया, जिनमें से दो आरोपी—बल्टू पाठक और सुरेंद्र सिंह—बाद में सरकारी गवाह बन गए।
31 मई 2007 को रायपुर की विशेष अदालत ने 28 आरोपियों को दोषी ठहरायाउसी फैसले में अमित जोगी को अपर्याप्त साक्ष्यों के चलते बरी कर दिया गयाइसके बाद मृतक के बेटे सतीश जग्गी ने फैसले को चुनौती दीलंबी न्यायिक प्रक्रिया, गवाहों के बयान, और साक्ष्यों के पुनर्मूल्यांकन के बाद अब जाकर हाईकोर्ट ने यह अहम फैसला सुनाया है।
छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री स्व.अजीत जोगी के पुत्र और जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के अध्यक्ष अमित जोगी का नाम इस मामले में शुरू से ही चर्चा में रहा है।फैसले के बाद छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं और मामले के अगले कानूनी कदम पर सभी की नजरें टिकी हैं।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब स्थिति यह है कि, अमित जोगी को 21 दिनों के भीतर सरेंडर करना होगा। उनके पास उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ पुनः सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प उपलब्ध है।
यदि उन्हें वहां से कोई अंतरिम राहत नहीं मिलती, तो आत्मसमर्पण अनिवार्य होगा।
